“सिंहासन खाली करो कि/जनता आती है” दिनकर की ये पंक्तियां आज सहज ही श्रीलंका की घटना देख कौंध उठी. किसी दौर में सकारात्मक बदलाव के लिए लिखित इन पंक्तियों को श्रीलंका में नकारात्मक बदलाव के तौर पर ही देखा जा सकता है. वहाँ लाखों लोगों की भीड़ ने राष्ट्रपति भवन को अपने कब्जे में कर लिया. बहुत से नागरिक उसके भीतर भी घुस चुके हैं. ऐसी अराजक स्थिति में वहाँ के राष्ट्रपति अपने आपको बचाते हुए राष्ट्रपति भवन से भाग निकले. वे भले ही वापस लौट आये हों मगर ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इस तरह की अराजक स्थिति पर जल्द ही नियंत्रण न हुआ तो वहाँ के प्रधानमंत्री भी किसी भी समय भाग सकते हैं.
यह प्रथम दृष्टया भले ही जनता का विद्रोह समझ आ रहा हो मगर श्रीलंका की वास्तविक स्थिति से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है. सिंहासन भले ही खाली हो गया हो, सर्वदलीय सरकार बनाये जाने पर सहमति भले ही बन गई हो, जनता ने भले ही राष्ट्रपति भवन को अपने कब्जे में ले लिया हो मगर श्रीलंका की जनता नहीं जानती कि उसका भविष्य क्या है? वर्तमान हालात उनके भविष्य को किस दिशा में ले जायेंगे? श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त हो चुका है. देश पेट्रोलियम उत्पाद नहीं खरीद सकता. वहाँ के स्कूल, कॉलेज बंद किये जा चुके हैं. आम नागरिक रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं से वंचित हैं. वस्तुओं की कीमतें दो सौ प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ चुकी हैं. पानी, बिजली, दवाइयाँ, अनाज आदि मूलभूत वस्तुएँ नागरिकों की पहुँच से बाहर हो चुकी हैं. लोग अनिवार्य चीजों को लेने के लिए लाइनों में मरने को विवश हैं.
आज जिस स्थिति में राष्ट्रपतिभवन, प्रधानमंत्री निवास वहाँ की जनता के आक्रोश का सामना कर रहा है तो वह अचानक से नहीं हुआ है. उसके लिए यदि श्रीलंका की स्थिति पर गौर करें तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि श्रीलंका पर 57 अरब डॉलर से भी ज्यादा का विदेशी कर्ज है. इस कर्ज में से लगभग 11 करोड़ डॉलर का प्रत्यक्ष कर्जउसने चीन से ले रखा है. अप्रत्यक्ष रूप से भी श्रीलंका के बाजारमें चीन की रकम लगी हुई है. एक अनुमान के मुताबिक श्रीलंका के बाजार की देनदारी में भी चीन का लगभग पचास प्रतिशत धन लगा हुआ है. इससे स्पष्ट है कि श्रीलंका पूरी तरह से चीन की कर्ज़नीति में फँस चुका है. अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से श्रीलंका द्वारा तीन अरब डॉलर का कर्ज माँगा गया, ताकि वह इस संकट से उबर सके. मुद्रा कोष ने श्रीलंका की स्थिति को देखते हुए उसकी इस माँग को नकार दिया.
सोचने वाली बात है कि ऐसी स्थिति में यह द्विपीय देश कैसे पहुँच गया? इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे जाने की आवश्यकता है. एक दशक से अधिक समय पूर्व, मई 2009 में लिट्टे का खात्मा हुआ और वर्षों से चल रहे गृह युद्ध में श्रीलंका की सेना विजयी हुई. इन दो बड़ी घटनाओं के सापेक्ष युद्ध नायक के रूप महिंद्रा राजपक्षे का उदय हुआ. महिंद्रा राजपक्षे सबसे सशक्त सिंघली नेता के रूप में उभरे. यही वह समय था जब भारत के विरुद्ध माहौल बनाया जाने लगा. इसका कारण भारत का तमिलों के प्रति मानवीय सहानुभूति रखना था. राजपक्षे परिवार ने भारत को अपना शत्रु सा समझते हुए भारत से अधिक चीन पर विश्वास किया.
श्रीलंका को युद्ध से उबारने के लिए, अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के नाम पर चीन से बड़े-बड़े निवेश प्राप्त किये गए. अरबों डॉलर के कर्ज लिए गए. चीन को तो ऐसे मौकों की तलाश रहती है जहाँ वो अपनी शर्तों पर निवेश कर सरकार, सत्ता, नीतियों पर नियंत्रण कर सके. ऐसा वह विशेष रूप से भारत के पड़ोसी देशों में और अधिक करता है, ताकि अप्रत्यक्ष रूप से वह भारत पर दबाव बना सके. श्रीलंका में इसे संयोग नहीं कहा जायेगा कि एक ही परिवार के लोग सरकार और सेना के सभी महत्वपूर्ण पदों पर बैठा दिए गए. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सेनापति सभी एक परिवार से आ गए और विडम्बना यह कि वह परिवार चीन के हाथों में खेलता रहा. रही सही कसर सरकार की एक्सपेरिमेंटल पॉलिसीस ने पूरी कर दी. इसमें सबसे बड़ा खामियाजा श्रीलंका को देश में अचानक से ऑर्गेनिक खेती को लागू कर देने के कारण उठाना पड़ा. इस निर्णय पर एक पल को भी विचार नहीं किया गया कि इस तरह के निर्णय से उपज और अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर होगा? कृषि अर्थव्यवस्था के लड़खड़ाने के दौर में कोरोना महामारी ने देश के उद्योग धंधों को तबाह कर दिया. इसी के साथ-साथ श्रीलंका की आमदनी का दूसरा बड़ा स्रोत पर्यटन भी ध्वस्त हो गया. इस सबसे अर्थव्यवस्था गहरे दबाव में आ गई. ऐसी विषम स्थिति में श्रीलंका सरकार कड़े और उपयुक्त कदम नहीं उठा सकी. सब्सिडी के बोझ, लॉलीपॉप पॉलिसीस ने हालात को बद से बदतर बना दिया.
भारत इस संकट के समय को नजरंदाज नहीं कर सकता है. भारत की भू-राजनीतिक स्थिति पर श्रीलंका के इस गहरे संकट के गम्भीर मायने हैं. हिन्द महासागर में स्थित यह दक्षिण एशियाई देश विश्व के दो तिहाई पेट्रोलियम और व्यापारिक जहाजों का आवागमन मार्ग है. यह भारत के दक्षिण प्रायद्वीप के एकदम निकट पाक जलडमरूमध्य द्वारा जुड़ा है. यह वो क्षेत्र है जो अरब सागर और बंगाल की खाड़ी को हिन्द महासागर से जोड़ता है. यह क्षेत्र न सिर्फ भारत की व्यापारिक गतिविधियों का क्षेत्र है अपितु दक्षिण एशिया की सुरक्षा को भी बहुत ज्यादा प्रभावित करता है. यह हमारी मुख्य भूमि और सामुद्रिक स्थिति दोनों को ही सामरिक दृष्टि से प्रभावित करता है. ऐसे में श्रीलंका के इस तरह चीन के आर्थिक नियंत्रण में आ जाने को भारत द्वारा नज़रअंदाज़ नही कर सकता है.
श्रीलंका सार्क देशों में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है और यह व्यापार 2020 तक लगभग 3.6 बिलियन यूएस डॉलर के बराबर था. वर्ष 2000 से दोनों ही देशों के मध्य मुक्त व्यापार समझौता (ISFTA) अस्तित्व में है, जिससे ड्यूटी पर रियायते दी जा रही हैं. फरवरी 2015 में भारत और श्रीलंका के मध्य एक असैनिक परमाणु समझौता भी किया गया है. इस प्रकार भारत के सम्यक हित स्थिर, सुरक्षित और मुक्त श्रीलंका में निहित हैं. भारत सरकार श्रीलंका को मदद दे रही है, जिससे वह संकट से उबर सके लेकिन श्रीलंका में वर्तमान में आया यह संकट बहुआयामी है. यह श्रीलंका के नेतृत्व, साख, इच्छाशक्ति और अस्तित्व का भी संकट है. यह वैश्विक शक्ति समीकरणों के बदलने का दौर है. ऐसा लगता है कि नई इबारतें अर्थव्यवस्थाओं की लाशों पर लिखी जाएंगी. एक द्विपीय देश अपनी सरकार की गलत नीतियों में असमय मरने को विवश है.

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