शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023

इस्राइल फिलिस्तीन जंग

इस्राइल हमास की जंग जो अब जाकर इस्राइल फिलिस्तीन की जंग बन पाई है, उसका दायरा बढ़ता हुआ देखा जा सकता है। हमास ने इस्राइल पर दुस्साहसिक हमला कर स्वयं को हीरो साबित करने का प्रयास किया जो इस्राइल के सख्त प्रतिरोध से उलट पड़ गया।अब अपनी चाल बदलते हुए हमास और मुस्लिम संसार इसे बेचारे फिलिस्तीन का शोषण के विरुद्ध प्रतिकार बनाने में लगे हैं। दुनिया भर में मुस्लिमों को सड़कों पर एक नियोजित तरीके से उतारा जा रहा है। अमेरिकी दूतावास, अड्डे, नागरिक और इस्राइल का समर्थन करने वाले लोग निशाने पर हैं। युद्ध मे आतंकी संगठन और मुस्लिम देश   दुनिया भर के मुस्लिमों को हथियार की तरह प्रयोग करेंगे। देर सबेर नाटो को युद्ध मे सक्रिय होना पड़ सकता है, तब नाटो को दबाव में लेने के लिए ये सड़को पर 'तेरा मेरा नाता क्या...'  चिल्लाने वाले काम आएंगे।




युद्ध की निरंतर बदलती परिस्थितियां क्या मोड़ लेगी फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन ये ज़रूर सोचने लायक विषय है कि नॉन-इस्लामिक मुल्कों से बाहर इस्लाम को मानने वालों का प्रसार कितने गंभीर सुरक्षा संकट पैदा कर सकता है। जिस देश मे ये रह रहे हैं उसके तो कभी होंगे नहीं, लेकिन जिस लड़ाई से इनका एक रत्ती का भी नाता नहीं है उसके लिए उस देश को आग में झोंक देंगे जो इन्हें पाल रहा है। मानवता और उदारवादी सोच के नाम पर दुनिया भर में शरणार्थी बन कर शरण पाने वाले मुस्लिम, अवैध घुसपैठ के द्वारा इनकी बाढ़ सब कुछ बहुत नियोजित तरीके से गैर मुस्लिम देशों के साथ किया जा रहा है, ऐसा पहली बार सुनने को मिला है कि जॉर्डन और मिस्त्र में इन फिलिस्तीनी शरणार्थियों को भेजने की बात की जा रही हालांकि अभी तक इन दोनों देशों ने इसकी सहमति नहीं दी है। ये देश इनको बसाने के बजाय युद्ध मे कूद जाएं तो आश्चर्य नही होना चाहिए, हाँ यदि कोई गैर मुस्लिम देश यहाँ होता तो दुनिया भर के मुस्लिम संगठन, देश उस बेचारे देश को इन मुसलमानों से भर देते। याद कीजिये कैसे लाखों बंगलादेशी मुसलमानों को भारत में घुसेड़ दिया गया। हज़ारों रोहिंगया को भारत के आंतरिक इलाकों में बसा दिया गया। कैसे इस युद्ध में भी मुसलमान फिलिस्तीन के पक्ष में लामबंद होकर नीति को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं। संदेश साफ है ये टकराव है इस्लाम की सनक का शेष नॉन-इस्लामिक जगत से। ये जब तक आप प्रतिकार नही करेंगे आपको नोचेंगे, काटेंगे बर्बाद करेंगे। जब आप प्रतिकार करेंगे तो ये इस्लामी कार्ड खेलेंगे, जो आपके धन, संसाधन, ज़मीन पर पल रहे हैं वो आस्तीन के साँप आपको डसेंगे। इस्राइल का प्रतिकार,उसका चरित्र हर उस देश को अपनाने की ज़रूरत है जो इस्लाम की जिहादी सनक का मुकाबला कर ज़िंदा रहना चाहता है।

 

20.10.23

 


गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

उत्तरपूर्व राज्य में हिंसा का कारण जनसांख्यिकीय परिवर्तन

जनसांख्यिकी, मानव जनसंख्या का सांख्यिकीय अध्ययन है जो किसी गतिशील आबादी पर लागू किया जाता है. समस्या की गंभीरता को समझाने के लिए कई बार उत्तरपूर्वी राज्यों की जनसांख्यिकी के लिए जनसांख्यिकीय आक्रमणशब्द का भी प्रयोग किया जाता है. उत्तरपूर्वी राज्य भारत की सुरक्षा के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं. इस क्षेत्र में सात राज्य हैं, जिन्हें सेवेन सिस्टर्स के नाम से संबोधित किया जाता रहा है. ये राज्य अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड एवं त्रिपुरा हैं. वैसे तो सिक्किम भी पूर्वोत्तर का भाग है किन्तु वह बाद में भारतीय संघ का हिस्सा बना. इसी कारण अब इस पूर्वोत्तर भाग को सेवन सिस्टर्स और वन ब्रदर से सम्बोधित किया जाता है. पूर्वोत्तर में 160 से भी अधिक अनुसूचित जातीय समूह एवं 200 से भी अधिक भाषाएँ बोली जाती हैं. उत्तरपूर्वी राज्य जातीय, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं भाषाई विभिन्नता का सटीक उदाहरण हैं. इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण विशेषता इसकी सीमाओं का अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं से आबद्ध होना है, जो चीन, नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, भूटान के साथ साझा होती हैं. इसमें चीन में 1395 किमी, म्यांमार के साथ 1640 किमी, 1596 किमी बांग्लादेश के साथ, 97 किमी नेपाल के साथ, 455 किमी भूटान के साथ जुड़ती है. अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं से जुड़े होने के कारण यह क्षेत्र सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव डालता है.

 



स्वतंत्रता के बाद से ही इन राज्यों ने अलगाववाद और निम्न तीव्रता संघर्ष का लम्बा दौर देखा है. अपनी नृजातीय पहचान और आदिवासी संस्कृति के मिट जाने के भय ने आम लोगों को राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ने में अवरोध पैदा किया है. अनेक नृजातीय समूहों के अंतर्द्वंद एवं बाह्य हस्तक्षेप ने समस्या को अत्यधिक जटिल बना दिया है. जिसका मुख्य कारण सीमा पार से निरंतर चल रहे अवैध घुसपैठ और प्रवासियों का दबाव है. इस अवैध घुसपैठ ने राज्य की जनसंख्या की संरचना को बदल कर रख दिया है. कई क्षेत्रों में मूल निवासी अल्पसंख्यक हो चुके हैं.

 

पूर्वोतर राज्यों में असामान्य वृद्धि दर के महत्वपूर्ण कारण अवैध आव्रजन की समस्या और धर्मान्तरण है. अवैध रूप से आने वालों में बांग्लादेश एवं म्यांमार से आये हुए शरणार्थी जिसमें रोहिंग्या, चकमा एवं हाजोंग शामिल हैं. ये अरुणाचल प्रदेश एवं असम सहित दूसरे राज्यों में फैले हैं. असम इस अवैध आव्रजन का सबसे बड़ा शिकार रहा है. 1951 से ही बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी और दूसरे शरणार्थी राज्य के संसाधनों पर बोझ बने हुए हैं. आज इनकी अलग से पहचान कर पाना भी मुश्किल हो गया है. 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 45 लाख लोग असम में अवैध रूप से रह रहे हैं. स्थानीय राजनीतिज्ञों के कारण इनके फ़र्ज़ी दस्तावेज़ एवं पहचानपत्र आदि बनवा दिए गए हैं. ये शरणार्थी असम के कई जिलों में चुनाव में निर्णायक रूप से प्रभाव डालते हैं. अवैध रूप से रह रहे शरणार्थी, घुसपैठिये सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा हैं. इन समस्याओं से निपटने के लिए 1983 में एक ट्रिब्यूनल, IMDT का गठन किया गया, जिसने तीन लाख घुसपैठियों को वापस भेजा. अगले कुछ वर्षों में 12424 लोगों की पहचान की गई जिसमें 1481 को ही वापस भेजा जा सका. वर्ष 2005 में उच्चतम न्यायालय द्वारा इसे निरस्त कर  दिया गया.

 

उत्तरपूर्वी राज्यों की जनसांख्यिकी में बहुत तेज़ी से परिर्तन आया है. मूल धार्मिक आबादी तीन राज्यों में अल्पसंख्यक हो चुकी है. मेघालय, मिजोरम, नागालैंड ईसाई बहुल हो चुके हैं. अगले दशक तक यदि धर्मान्तरण इसी गति से चलता रहा तो अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर भी ईसाई बहुल प्रदेश हो जायेंगे. अरुणाचल प्रदेश में ईसाई जनसंख्या वृद्धि की दशकीय दर 100% से भी अधिक रही. मणिपुर में यह 19% से बढ़ कर 41% हो गई. हाल में ही मणिपुर में हुई हिंसक घटनाओं में राज्य के कुकी और मैतैयी समूहों के मध्य हिंसक झड़पें हुईं, जिसके मूल में आदिवासी पहचान का संकट और धार्मिक असुरक्षा है. बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समूहों के मध्य टकराव संसाधनों पर पहुँच के संकट से उत्पन्न हुआ है. 

 

भारत की भूराजनीतिक स्थिति, मिश्रित आबादी, जनसंख्या दबाव, भाषाई, क्षेत्रीय विभिन्नताएँ, पहचान सम्बन्धी आकांक्षायें आदि टकराव का कारण हैं. पूर्वोतर भारत में उपरोक्त सभी कारणों से आम नागरिकों और प्रवासियों के मध्य टकराव देखा जाता है. राज्य की मूल जनसंख्या, आदिवासी समूह अपनी पहचान खो कर अल्पसंख्यक हो रहे हैं. संसाधनों पर भी उन्हें उनका अधिकार नहीं मिल पा रहा. यह विद्वेष का कारण है, जो अंत में हिंसा के रूप में परिलक्षित होता है. पूर्वोत्तर में सुरक्षा पर इसके जो प्रभाव देखे गए हैं, उनमें निम्न तीव्रता संघर्ष, अलगाववाद की भावना को मजबूती मिलना, नृजातीय संघर्ष, मादक द्रव्यों का व्यापार बढ़ना, अवैध मुद्रा का प्रवाह, संगठित अपराधों में बढ़ोत्तरी, आतंकवादी समूहों का जन्म, विदेशी हस्तक्षेप आदि प्रमुख हैं. 

 

अवैध आव्रजन ने इन राज्यों की सामाजिक, राजनैतिक संरचना में नकारात्मक प्रभाव डाले हैं. जमीन और संसाधनों का उचित अनुपात में वितरण तथा उचित  राजनैतिक प्रतिनिधित्व भी प्रभावित हुआ, जिस कारण असंतोष बढ़ा. उल्फा-नागा विद्रोह, मैतैय-कुकी संघर्ष, रोहिंग्या हिंसा, बहुसंख्यक आबादी और अल्पसंख्यकों के मध्य टकराव आदि जनसांख्यिकी में अप्राकृतिक परिवर्तनों के कारण उत्पन्न हुआ है. इस अराजकता को रोकने के लिए सीमा से पारगमन को कठिन बनाना. सीमा पर निगरानी एवं आधारभूत संरचनाओं का जाल बिछाना आवश्यक है. इसके साथ-साथ  एनआरसी को लागू किया जाये, साथ ही नागरिकता संबधी विवादों का निस्तारण भी किया जाये. इसके अलावा इस क्षेत्र के आर्थिक विकास की गति को तीव्र करना जरूरी है. ऐसे उपाय जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के परिणामस्वरूप सुरक्षा के लिए उत्पन्न चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं, यदि उन्हें पूर्ण इच्छाशक्ति के साथ लागू किया जाए.