शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

केन्द्रीय बजट : चुनौतियाँ भी, संभावनाएँ भी

 केन्द्रीय वित्तमंत्री सीतारमण द्वारा फरवरी के प्रथम कार्यदिवस में अपना पाँचवाँ केंद्रीय बजट प्रस्तुत किया गया। इसमें 45 लाख करोड़ रुपये का लेखा जोखा प्रस्तुत किया गया। केंद्रीय बजट किसी वित्तीय वर्ष में होने वाली आमदनी और खर्चों से जुड़ा दस्तावेज है। यह बजट दक्षिण एशियाई देशों में आये आर्थिक संकट और वैश्विक परिस्थितियों के मद्देनजर अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहाँ सरकार को एक तरफ समावेशी विकास का लक्ष्य पूरा करना है, वहीं अर्थव्यवस्था को वैश्विक दबाव से बचाये रखना है। कोविडकाल की समस्याओं पर नियंत्रण के साथ-साथ उद्योगों और कृषि क्षेत्र को पूंजी की उपलब्धता भी बनाये रखनी है। बाज़ार में मुद्रा का प्रवाह बनाये रखने तथा मध्यम वर्ग को राहत देते हुए सब्सिडी के बोझ को कम करना सरकार के समक्ष बेहद बड़ी चुनौतियाँ रही हैं।


अभी हाल में ही हमने श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को धराशाई होते देखा है। ऐसी ही स्थिति की ओर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भी बढ़ रही है। कोविड से उत्पन्न चुनौतियों के साथ-साथ इन देशों में उनकी आंतरिक समस्याओं  को वहाँ की सरकारें सही तरीके से नियंत्रित नहीं कर सकीं। उनकी आंतरिक गलत नीतियों और अन्य समस्यायों पर अनियंत्रण के कारण अर्थव्यवस्था दबाव से बाहर नहीं आ सकी। ऐसा नहीं है कि आर्थिक संकट एशियाई देशों के सामने ही है। वर्तमान में वैश्विक अर्थव्यवस्था भी रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण गहरे दबाव और अनिश्चितता के दौर से गुज़र रही है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला यूरोप और रूस के टकराव के कारण बाधित है। ऐसे में सरकार के समक्ष संतुलित एवं विकासोन्मुख बजट प्रस्तुत करना अपने आपमें चुनौती भरा कदम था। वित्तमंत्री द्वारा वृद्धि दर को 7 प्रतिशत लक्ष्य किया गया है किंतु विशेषज्ञ इसे प्राप्त करना फिलहाल संभव नहीं मान रहे हैं। इसके बारे में अभी से एक निश्चित राय बना लेना जल्दबाजी होगी। कोविड जैसी महामारी के बाद सरकार ने न केवल अपनी अर्थव्यवस्था को बचाए रखा है बल्कि दूसरे देशों को भी सहायता दी है। ऐसे में यदि बजट की चुनौतियों से पार पा लिया गया तो वृद्धि दर के लक्ष्य को कुछ हद तक प्राप्त किया जा सकता है।




बजट में एक प्रमुख लक्ष्य राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करना है। यह एक विरोधाभासी तथ्य है कि एक तरफ विकास की रफ्तार तेज करने के प्रयास हैं, दूसरी तरफ राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करना है। राजकोषीय घाटा समस्त प्राप्तियों और व्यय के असंतुलन के कारण होता है। यह एक प्रकार से आधारभूत परियोजनाओं में धन लगाने का प्रतीक है। यदि उसे नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है तो वह आधारभूत सरंचनाओं में निवेश की गति को धीमा कर देता है। ऐसा होने की स्थिति में विकास की गति नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है। फिलहाल इस बजट में 5.9 प्रतिशत राजकोषीय घाटे का अनुमान लगाया गया है किंतु वर्ष 2025-26 तक इसे गिराकर 4.5% तक लाने का लक्ष्य है।


राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने हेतु एक प्रयास कर्ज पर दिए जाने वाले ब्याज की धनराशि को बचाने का होना चाहिए। इसके लिए सरकार द्वारा कर्ज को कम करने का प्रयास करना चाहिए। इससे ब्याज़ पर जाने वाली धनराशि को बचाकर कुछ राहत पाई जा सकती है। देखा जाये तो वर्ष 2023-24 के केंद्रीय व्यय बजट में सबसे बड़ी मद ब्याज की अदायगी ही है। यह धनराशि 10,79,971 करोड़ करोड़ रुपये है, जो विकास को गति देने वाले पूंजीगत निवेश की धनराशि से अधिक है। इस बजट में पूंजीगत निवेश में 10 लाख करोड़ रुपये व्यय किये जायेंगे। इस अंतर से ही राजकोषीय घाटे की अर्थव्यवस्था को समझा जा सकता है।


मझोले, छोटे उद्योगों के साथ-साथ मध्यम वर्ग को इस बजट में प्राथमिकता पर रखा गया है। एमएसएमई को 9000 करोड़ रुपये क्रेडिट गारंटी के अंतर्गत देने से इस सेक्टर को गति मिलने की आशा है। वहीं मध्यम वर्ग को राहत देते हुए 7 लाख रुपये तक की आय को कर मुक्त रखा गया है। स्टैण्डर्ड डिडक्शन मिल जाने के बाद यह धनराशि साढ़े सात लाख रुपये तक पहुँचती है। महिलाओं को दो लाख रुपये तक कि बचत पर महिला सम्मान बचत पत्र योजना के अंतर्गत 7.5 प्रतिशत का ब्याज़ देने का प्रावधान किया गया है। इसी तरह वरिष्ठ नागरिकों की बचत सीमा को नौ लाख रुपये तक बढ़ा कर बचत को प्रोत्साहित करने का प्रयास भी किया गया है।


चालू वित्त वर्ष में खाद्य, उर्वरक, पेट्रोलियम और अन्य कई योजनाओं के अंतर्गत 3,55,639 करोड़ रुपये की सब्सिडी अनुमानित है। यद्यपि पहली बार इस बजट में सब्सिडी पर एकसाथ 28.2 प्रतिशत की कटौती की गई है, जिससे मँहगाई बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है तथापि सब्सिडी को कम करना इस समय अत्यावश्यक कदम है। ऐसा नहीं है कि एकमुश्त इतनी बड़ी राशि में सब्सिडी को समाप्त करके जनहित योजनाओं को नजरंदाज किया गया है। मुफ्त राशन योजना एवं प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के अंतर्गत तीन लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी को जारी रखा गया है।


कृषि, शिक्षा, रक्षा, रेलवे, स्वास्थ्य जैसे पारंपरिक क्षेत्रों के लिए धन उपलब्ध करवाया गया है। कृषि क्षेत्र में स्टार्टअप के लिए 20 लाख करोड़ रुपये, रेलवे को नई परियोजनाओं हेतु 75 हज़ार करोड़ रुपये का अतिरिक्त फंड, रक्षा बजट में 13 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी, 5जी के लिए धन की व्यवस्था नए भारत के नए सपनों का आधार रखने वाली है। 50 नए हवाई अड्डों के निर्माण, हवाई सफर को सस्ता करने का प्रयास, इलेक्ट्रॉनिक वाहनों की खरीद में छूट आदि इसी दिशा में उठाये गए कदम हैं। इस बजट में विकास, पर्यावरण, सीवेज सिस्टम, कार्बन उत्सर्जन आदि पर ध्यान दिया जाना सरकार की दूरदर्शिता एवं प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का प्रतीक है।


आने वाला समय वैश्विक आर्थिक मंदी के संकेत दे रहा है। ऐसे में यह ज़रूरी है कि संतुलित, सधे हुए कदमों से अर्थव्यवस्था की गति बनाये रखते हुए किसी भी जोखिम से बचा जाए। बजट इन अपेक्षाओं को वास्तविक धरातल पर उतारने में कितना सफल होगा ये तो वक्त बताएगा किंतु निश्चित रूप से बजट में इन जोखिमों और दबाव से निकलने का मार्ग बनाया गया है, जो प्रसंशनीय है। वर्तमान केन्द्रीय बजट आगामी वर्ष के चुनावों को देखते हुए तैयार नहीं किया गया है बल्कि अमृतकाल की संभावनाओं को साकार करने की दृष्टि से बनाया गया लगता है।  कुल मिला कर यह बजट उद्योगों, कृषि, मध्यम वर्ग को राहत देने वाला और पूंजी निवेश को आकर्षित करने वाला कहा जायेगा।