रविवार, 3 सितंबर 2023

नाज़ुक परों पर उम्मीदों का बोझ न लादें

“आपने मेरे बचपन और बच्चा होने का फायदा उठाया, मुझे विज्ञान पढ़ने के लिए मजबूर किया. आप मेरी छोटी बहन के साथ ये मत करना, उसे वो पढ़ने देना जो वो पढ़ना चाहती है.” ये शब्द हैं उस पत्र के जिसे वर्ष 2016 में जेईई की तैयारी करने वाली एक छात्रा कृति त्रिपाठी ने आत्महत्या से पहले अपनी माँ को लिखा था. ऐसा उसने कम अंक आने के कारण नहीं किया था बल्कि वह मानसिक रूप से परेशान हो गई थी. उसने अपने मित्र को भी लिखा था कि “कोई विश्वास नहीं करेगा कि मेरे जैसी नब्बे प्रतिशत लाने वाली लड़की सुसाइड कर सकती है. लेकिन मैं बता नहीं सकती कि मेरे अंदर कितनी नफरत भरी है.” आखिर किसी विद्यार्थी के मन में ऐसी नफरत क्यों पनप उठी कि उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा?


इस सवाल के आईने में यदि हम कोचिंग मंडी के रूप में प्रसिद्ध शहर कोटा की विगत कुछ माह की घटनाओं को देखें तो बहुत कुछ साफ़-साफ़ दिखाई देगा. इस शहर में पूरे भारत से छात्र, छात्राएँ इंजीनियरिंग, मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं. पिछले कुछ माह से यह शहर छात्रों की आत्महत्या के कारण लगातार सुर्ख़ियों में है. पिछले आठ माह में चौबीस छात्र आत्महत्या कर चुके हैं, उनमें से आधे से ज़्यादा छात्र नाबालिग़ थे. इस वर्ष आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों में पंद्रह वर्ष का एक बच्चा भी शामिल है जो सिर्फ एक महीने पहले ही कोटा आया था और बारह छात्र ऐसे थे, जिन्होंने कोटा पहुँचने के छह महीने के भीतर ही आत्महत्या कर ली.




प्रवेश परीक्षाओं में सफलता का सपना लिए पूरे देश से लाखों बच्चे इस शहर आते हैं. लगभग ढाई लाख से भी अधिक विद्यार्थी अलग-अलग कोचिंग संस्थानों में पढ़ते हैं. पूरे शहर में लगभग चार हजार हॉस्टल्स, इससे ज्यादा पीजी और अनेक लॉज हैं, जिनमें अपना घर छोड़ कर आने वाले बच्चे रहते हैं. इन विद्यार्थियों से ही इस शहर की आमदनी का पहिया घूम रहा है. अपने घरों को छोड़ एक अनजान शहर में संघर्ष की भट्टी में झोंके गए अधिकांश विद्यार्थी नाबालिग होते हैं. इन संस्थानों में प्रवेश के लिए इनके अभिभावक एक लाख रुपये से लेकर तीन लाख रुपये तक फीस भरते हैं. इसके अलावा वे रहने, खाने-पीने और अन्य व्यवस्थाओं पर भी बड़ी राशि खर्च करते हैं. आसानी से समझा जा सकता है कि एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सालाना चार से पाँच लाख रुपये का खर्च आसान नहीं है. कैरियर की चकाचौंध के वशीभूत यहाँ आने वाले विद्यार्थी अपने अवयस्क हृदय पर यह बोझ लेकर ही आते हैं. यहाँ आने के बाद इन विद्यार्थियों का तनाव भरा एकाकी जीवन आरम्भ होता है. घर, स्कूल, दोस्त, आराम, मस्ती आदि  सब कहीं पीछे छूट जाते हैं. यदि इनके साथ होती है तो बस वो गलाकाट प्रतियोगिता, जिसमें इन युवाओं को मशीन बन कर दौड़ना होता है.


कोचिंग संस्थानों के लिए ये विद्यार्थी कमाई का साधन मात्र हैं. गैरकानूनी ढंग से व्यवसाय कर रही तमाम कोचिंग में कई विद्यार्थी कक्षा आठ, नौ के स्तर के होते हैं. ऐसे विद्यार्थियों को भी ये कोचिंग मंडी अपने व्यापार में घसीट लेती है. इनका डमी प्रवेश किसी स्कूल में करवा दिया जाता है, जहाँ पर कभी स्कूल न जाने के बाद भी उसमें प्रवेश बना रहता है. इन कोचिंग ठेकेदारों की मानसिकता से अभिभावकों की भी मानसिकता साम्य स्थापित कर लेती है. इसी कारण वे अपने ही बच्चे की योग्यता, रुझान, क्षमता, मनोस्थिति, खान-पान, आराम आदि को दरकिनार कर उनको उस सपने के पीछे भागने को विवश करते हैं, जो शायद उस किशोर हृदय ने कभी देखा ही न हो. किसी और के सपनों को पूरा करने के लिए इन किशोरों को कोचिंग मंडियों में ईंधन की तरह प्रयोग किया जा रहा है.


कोचिंग संस्थान, अभिभावक और स्वयं तैयारी करने वाले भी जानते हैं कि सफलता की दर मात्र एक, दो प्रतिशत है लेकिन सच को जानना और उसे स्वीकार करना दो बिल्कुल अलग बातें हैं. एक अवयस्क विद्यार्थी इस कटु सच को स्वीकार कर तभी आगे बढ़ सकता है जब उन्हें समझाया जाये और उस अनावश्यक दबाव से मुक्त रखा जाए जो माता-पिता, कोचिंग और स्वयं असफलता उन पर बनाती है.


इन सबके बीच दुखद यह है कि प्रतिस्पर्धा और तथाकथित सफलता का यह भूत किसी के अन्तर्मन को जागने नहीं देता है और बाल अधिकारों का हनन लगातार होता रहता है. कोचिंग संस्थानों की कार्यशैली, बच्चों को एटीएम समझने की सोच और विज्ञापन संस्कृति बड़े सपनों का बोझ लादे आम परिवारों से आये इन बच्चों के मनोबल को तोड़ देती है. कोचिंग संस्थानों द्वारा लगातार मॉक टेस्ट लेना, कम स्कोर करने वाले विद्यार्थियों को डीग्रेड कर दूसरे बैचों में डालना, अच्छे अंक लाने वालों को विशेष बैच में स्थानांतरित करना भी प्रतियोगियों के लिये अवसाद का कारण बनता है. गौरतलब है कि आत्महत्या करने वाले कई छात्रों द्वारा ऐसा कदम मॉक टेस्ट के परिणाम आने के बाद ही उठाया गया. बेहतर न कर पाने का दुख, डीग्रेड हो जाने की चिंता, असहाय अकेला मन, अभिभावकों को परिणाम देने का दबाव आदि मिलकर अवसाद की एक ऐसी खाई खोदता है जिससे बाहर निकलने में कई बच्चे असमर्थ हो जाते हैं और वे वह रास्ता चुनते हैं जहाँ से लौटने का कोई मार्ग नहीं.


नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार भारत मे औसतन प्रतिदिन 35 विद्यार्थी परीक्षा में असफल होने पर आत्महत्या का मार्ग चुनते हैं. कोटा में लगभग हर माह तीन बच्चे अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं. आत्महत्या की इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन द्वारा अनेक प्रयास किये जा रहे है. कई तरह के उपकरणों द्वारा इन बच्चों पर नज़र रखने, कमरों में अलार्म लगवाने आदि आदि जैसी व्यवस्थाएं एक फौरी उपाय हो सकती हैं लेकिन समस्या का समाधान नहीं. इन कोचिंग संस्थानों की कार्यशैली पर नज़र रखने के साथ इन्हें नियम कायदों में बाँधना आवश्यक है. सरकार को भी प्रतियोगी छात्रों पर दबाव कम करने हेतु केंद्रीकृत व्यवस्था के अतिरिक्त राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं का भी विकल्प खुला रखना चाहिए.


अभिभावकों और प्रतियोगियों को यह समझना होगा कि इंजीनियर या डॉक्टर न बन पाने का मतलब जीवन में संभावनाओं का अंत नहीं है. सफलता किसी एक व्यवसाय से बंधी नहीं हैं. अपने बच्चे के नाज़ुक परों पर उम्मीदों का ऐसा बोझ न लादें कि उसका जीवन से ही मोह भंग हो जाये. उड़ने दीजिये उन्हें उन्मुक्त आकाश में, वे निश्चित ही अच्छा करेंगे.


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